तार ओर पोस्टकार्ड
जय श्रीराम।।
आज की बात-कल दैनिक भाष्कर में एक आलेख पढ़ा "निर्जीव भी बोलते है"बहुत ही सार्थक लगा,एक जमाना था जब व्यक्तिगत समाचार सम्प्रेषण का एक मात्र साधन डाक सेवा ही हुवा करती थी,पत्र ही समाचार भेजने के माध्यम हुवा करते थे,टेलीफोन सेवा हर जगह उपलब्ध नही थी तथा न ही हर व्यक्ति की पहुच थी।पोस्टकार्ड,अंतर्देशीय पत्र एवम् लिफाफा मुख्य माध्यम थे,त्वरित के लिए "टेलीग्राम"हुवा करता था जिसको "तार"बोलते थे,तार आने का मतलब एक बार तो सांसे ऊँची चढ़ा देता,दुःखद समाचार ही ज्यादा मिलते थे,फौजी भाई छुट्टी लेने के लिए अपने घर वालो से तार ही लगवाते"वाईफ सीरियस,कम सून" यही पॉपुलर एवम् सर्वभौमिक मैसेज होता,फोजी भाई घरवाली को "फेमेली"ही बोलते थे,फेमेली के बीमार होने का टेलीग्राम जाते ही प्लाटून कमांडर तुरन्त छुट्टी स्वीकार कर देता,सामन्यतया किसी घर में तार आने पर जब तक पढ़ा नही लेते तब तक अनहोनी आशंका रहती थी,तार अंग्रेजी में आता था,इसलिये हर कोई पढ़ भी नही पता,स्कूल के मास्टर जी या किसी पढ़े लिखे व्यक्ति को बुलाकर पढ़वाया जाता,दुःखद समाचार आने पर कोहराम मच जाता,तार आने का डर ही लगता।तार का शुल्क शब्दों की संख्या के हिसाब से लगता था इसलिए इसमें शार्ट में मैसेज लिखा जाता था,अब तो "तार"को कोई जानता ही नही है,सरकार ने भी"तार महकमा"ही बन्द कर दिया।
समाचार भेजने का सबसे सस्ता माध्यम पोस्टकार्ड था,15 पैसे में पुरे भारत में कही भी समाचार भेजो कोई मनाही नही थी,पोस्टकार्ड तो आज भी मिलता है,कीमत भी मात्र 50 पैसे है पर अब लिखता कोन है,अब तो सभी के हाथो में आधुनिक तकनिकी से बने मोबाईल है जिसमे तरह तरह की सुविधा होती है,वीडियो कॉलिंग के द्वारा तो बातचीत करने वाले एक दूसरे की गतिविधियां भी देख लेते है।स्कूलो में भी पत्र लेखन सिखाया जाता था,सरकारी महकमे में किस प्रकार अर्जी देते है सीखाया जाता,परिवारजनो को किस प्रकार संबोधित करते हुये लिखा जाता है वो भी बताया जाता,व्याकरण में तो पत्र लेखन का अलग ही अध्याय होता था,अब भी होगा,अंतर्देशीय पत्र ज्यादातर वकील लोग नोटिस देने में एवम् होशियार लोग सरकारी महकमे में शिकायत भेजने में काम लेते,अंतर्देशीय पत्र की रजिस्ट्री करवाते,इसकी विशेषता यह होती की इसमें लिखा न तो कोई दूसरा पढ़ सकता और न ही इसके मैसेज को अलग निकाला जा सकता,क्योकि इसमें ही लिख कर फोल्ड करके भेजते थे,लिफाफे में पत्र बन्द होकर जाता,गोंद भी लगा हुवा आता है।सरकारी महकमे की डाक खाकी लिफाफो में आती है।विदेश में जो पत्र जाता था उसको हवाई पत्र कहते,वो भी अंतर्देशीय पत्र की तरह का होता है।
घाटवा में कुचामन से डाक का थैला आता था,स्व.रामधन जी शर्मा डाक वितरण करते थे,आपको सभी प्रेम से "रामू महाराज"कहते।डाक आने पर पोस्ट आफिस के पास भीड़ लग जाती,रामू महाराज पोस्ट आफिस का गेट बन्द करके पत्रो की छटनी करके मोहर लगा कर बाहर आते तो उन्हें सभी चारो और से घेर लेते,रामू महाराज ऊँची आवाज में नाम बोल बोल कर सुनाते,जिनका पत्र होता वो ले लेता,आस पड़ोसियों के भी ले जाते,करीब करीब डाक मौके पर ही वितरित हो जाती।ब्राह्मण,बणियो में लोग आसाम-बंगाल में रह कर नोकरी और व्यवसाय करते थे उनके "बापूजी"का पत्र आने पर अपार ख़ुशी होती,फोजी लोगो के भी खूब पत्र आते,कई फोजी तो रोमन अंग्रेजी में पत्र लिखते जिनको हर कोई तो पढ़ ही नही पाता,मेरे को ऎसे पत्र पढ़ने का अच्छा तुजुर्बा हो गया था,अब तो काम ही नही पड़ता।सेना में सेवारत सेनिको को जो पत्र भेजे जाते उनपर सर्वप्रथम सेनिक के नम्बर,उसका नाम,कंपनी का नाम एवम् बाद में 56 ए पी ओ,या 99 अ पी ओ लिखा जाता,यह बिलकुल भी पता नही चलता था की यह पत्र किस शहर और किस स्टेट में जायेगा,मात्र अ पी ओ के आधार पर ही पत्र जाते थे।अब तो पत्र लिखने और भेजने का सिस्टम ही बंद हो गया।
प्रेम पत्र भी खूब लिखे जाते,पतिदेव का लेटर प्राप्त कर श्रीमती जी इतनी खुश होती मानो उसको तीन लोक का राज ही मिल गया,सदाबहार शेर ओ शायरियां भी लिखी जाती थी जो अब चलन से बाहर हो गई,कई लोग तो पते के ऊपर स्पेशल नोट भी लगाते"......देवी के आलावा कोई न खोले"लिफाफे को पीछे चिपका कर उस पर पेन से धारियां बनाई जाती,ताकि कोई खोले तो पता चल सके,अपनी अपनी होशियारी सभी करते।खुला पत्र आने पर डाकिया डाक सुनाते समय ही ऐलान कर देता"देखल्यो ओ कागद खुल्लो आयो है,मन ओळमु नही मिलणु चाहिज"सभी उसकी ताकीद करते।
रूपये भेजने का माध्यम"मनीऑर्डर"होता था,जिसको हिंदी में"धनादेश"बोलते है,मनीऑर्डर आने पर तो ख़ुशी सातवे आसमान पर होती,डाकिया भी सर्वप्रथम मनीऑर्डर ही वितरित करता,रूपये भी डाक के खाखी थैले में एक छोटा चमड़े का थैला आता उसमे आते थे,जिसके रूपये आते उसको भुगतान करने पर एक अन्य आदमी से "भरपाई"के हस्ताक्षर करवाये जाते थे।
अब तो जमाना ही बदल गया,जो सपने में भी नही सोचा था वो साकार हो रहा है,मोबाईल से ही रूपये ट्रांसफर होते है,जब मर्जी आये ए टी एम से निकालो,पेंशन एवम् वेतन भी सीधे बैंक खाते में जमा होते है,अब तो रेवन्यू टिकिट लगा कर साइन करने ही नही पड़ते।टेक्नोलॉजी ने कई पुराने सिस्टम्स को बन्द कर दिया,नई तकनीक से काम सेकिण्डो में होने लगा है।परिवर्तन संसार का नियम है जो हर चीज पर लागु होता है।
मित्रो,आज के लिए बस इतना ही,आप भी अपने विचार व्यक्त करें।डाक सेवा से जुड़े अपने संस्मरण बताये।आपके विचारो का स्वागत होगा।

जय हिन्द
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