शारीरिक विकलांगता का मजाक उड़ाना पाप है

जय श्रीराम।।
आज की बात-"किसी की शारीरिक बनावट की हंसी उड़ाना ईश्वर की सत्ता का सरासर अपमान करना है"-मित्रो,मनुष्य जीवन 84 लाख योनियो को भुगतने के बाद मिलता है ऐसा वृतान्त धर्मग्रंथो में मिलता है।मनुष्य योनि प्राप्त होना बहुत दुर्लभ कार्य है।मनुष्य के रूप में हमे दुनिया में भेजना ईश्वरीय कार्य है।कोई किस की यहाँ जन्म लेगा ये न तो किसी को पता है और न ही हमारी इच्छा पर निर्भर करता है।शारिरिक सरंचना भी प्रभु के ही हाथ में है।काला-गौरा,मोटा-पतला,लंबा-नाटा होने में हमारा कोई वश नही चलता,रंग एवम् कद काठी तो भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार भी होती है,अलग अलग भू भाग पर रहने वालो का रंग एवम् कद अलग अलग होता है,भौगोलिक परिस्थितियां प्रकृति के देन है,अलग अलग वातावरण का निर्माण भी ईश्वरीय देन है।इस संसार में भांति भांति के लोग रहते है,कई विकलांग भी होते है,विकलांग दो प्रकार के होते है एक तो जन्मजात एवम् दूसरा किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण शारीरिक विकृति आना।सुंदरता भी भगवान की देन है तो विकलांगता भी ईश्वरीय माया है।मनुष्य का नैतिक दायित्व है की वो किसी की शारिरिक बनावट की मजाक नही उड़ाये,टीका-टिप्पणी नही करें।कोई काला है तो उसमे उसका क्या दोष है?कोई लँगड़ा है तो उसमे वो क्या करें?जंहा तक हो सके हमको विकलांगो की मदद करनी चाहिये,इनकी हौसला अफजाई करनी चाहिये,इनकी मजाक उड़ाना ईश्वरीय सत्ता का सीधा सीधा अपमान है।किसी को भी अपने शारिरिक सौष्ठव पर अभिमान नही करना चाहिये,हो सकता है कल हमको भी दुर्दिन देखने पड़ जाये।कई धुरंधरों को बैशाखी के सहारे चलते देखा है।जीवन में परिवर्तन कभी भी हो सकता है,कोई कुछ नही कह सकता।
      एक भजन बचपन से सुनते आये है"गरब करे सो गवारा,जोबन धन पवणियां दिन च्यारा......घमण्ड किसी को भी नही करना चाहिये,घमण्डी को कभी भी नीचा देखना पड़ सकता है।
      कई व्यक्ति जन्मजात मन्दबुद्धि होते है,क्या करें...मनुष्य योनी प्राप्त करके भी सुचारू जीवन नही जी सकते,ऐसे व्यक्तियो के लिए भी धर्मार्थ संस्थान एवम् सरकार स्कूल एवम् आवास की व्यवस्था करती है।कई अभागे ऐसे भी होते है जिनको अपने माता-पिता का भी ध्यान नही होता,हम आये दिन समाचार पत्रो में पढ़ते है "झाड़ियो में नवजात मिला"कई नवजातों को अनाथालय के पालने में छोड़ के चले जाते है,इन जन्म लेने वालों का क्या कसूर?कई सामाजिक संस्थाये इनके लालन पालन की व्यवस्था करती है जो बहुत ही श्रेष्ट कार्य है।वास्तव में निराश्रितों की मदद होनी चाहिये।हम लोग उजूल फिजूल में पैसा खर्च करते है,धर्म के नाम पर दिखावा करते है उसके स्थान पर पीड़ित मानवता की सेवा होनी चाहिये।अनाथालय,विमंदित बच्चों के स्कूल आदि में सहयोग करना चाहिये।आपको पुन्य फलीभूत होता दिखाई देगा,आत्म संतुष्टि मिलेगी,ऊपर कोई स्वर्ग-नर्क नही है,ऊपर तो अनन्त ब्रह्मांड है।स्वर्ग एवम् नरक जो कुछ है यही है।हम अपने कारनामो से अपने जीवन को नारकीय बना लेते है,जो सतकर्मी होते है उनके लिए ये दुनियां ही स्वर्ग है।मरने के बाद आत्मा तो चली जाती है,देह पंचतत्वों में विलीन हो जाती है,स्वर्ग यात्रा करने के लिए रहता ही क्या है?धर्म ग्रंथो में जो स्वर्ग-नर्क की व्याख्या की है वो मनुष्य को सही मार्ग पर चलने के लिए की है,नर्क का भय इसलिये दिखया गया की वो कुकृत्य नही करे,भय बिना सुधार नही होता,सरकार भी तो सुधार के लिए कानून बनाती है।
      मित्रो,लिखने को तो बहुत कुछ है,नीति की बाते लिखे उतनी ही कम है पर आज के लिए बस इतना ही,आप भी अपने विचार व्यक्त करेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी,आपके विचारो का स्वागत है।

Comments

  1. आधुनिक समय मे सही विश्लेषण एक बार जरूर पढ़ें

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