बस अपना फर्ज निभाता हु ..भारतीय रेल लोको पायलट
रात तीन बज रहे थे
ट्रेन 120 kmph पर दौड़ रही थी
लोहे से लोहे रगड़ने की आवाज़े
ट्रेन की गति के साथ बढती जा
रही थी
ट्रेन कभी शहरों से कभी जंगलो
से गुज़र रही थी
लोको के शोर के बाहर की दुनिया
शांत और सन्नाटे के आगोश में
पैर पसारे ख्वाबो में थी हेड लाइट
की 290 मीटर की लाईट में दो
कभी न मिलने वाली पटरिया..
दूरियों को अंतरालो में खंडित
कर चलती प्रतीत हो रही थी
पूस की रात थी केबिन में नोज
कम्पार्टमेंट की झिरियो से आती
ठंडी हवा जैसे मेरा इम्तेहान ले
रही थी
सब कुछ नियत गति से चल रहा था
शहरो गलियो में घोर अँधेरा बता
रहा था की सब सो रहे है
वो रात भी जैसे समय की छाती पर
सर तख क्रर झपकी लेती मालू
दे रही थी
मेरी भी पलके झपकने लगी थी
तभी प्लेटफार्म से लोको तक
पहुचने के कुछ दृश्य मेरी आँखों
में घुमने लगे ।
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वो नवविवाहित जोड़ा जिसे
बूड़ी माँ भीगी
पलकों से छोड़ने आई थी
वो काला मोती से सजा छोटा
गोल हाथ जिसकी अगुठा मुह
के अंदर था उसकी हिलती गर्दन,
नन्ही उगलियाँ नाना के कुर्ते का
कॉलर छोड़ना ही नहीं चाह
रही थी ,
वो पत्नी का रुदन चेहरा जिसका
फोजी पति छुट्टियों के बाद वापस
बॉर्डर पर ड्यूटी लौट रहा ,
वो मरीज़ को व्हील चेयर पर
ढोते तिमार दारो के मायूस चेहरे
सब कुछ लम्हों में ही दौड़ गया
सर से निगाहों में ।
मेरी सुस्ती भाग चुकी थी...
जानता हुं
मेरेे काम में वो वीर् रस नहीं है
जो किसी फोजी के बराबर
सम्मान मुझे दिला दे..
वो रूहानी शफा भी नहीं जो
डॉक्टर के समान किसी मुर्दा
मरीज़ को जीला दे..
बस एक मामूली जिम्मेदारी है
मै लोगो को मंजिल तक
पहुचाता हु ।।
बस अपना फ़र्ज़ निभाता हु ।।
एक लोको पायलट भारतीय रेल 🚄🚄🚅

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